Monday, May 1, 2017

"हत्याएं रोज होती हैं"

"हत्याएं रोज होती हैं"

हत्याएं होती हैं रोज़
कहीं गैस सिलेंडर के नाम पर
तो कहीं गैस चैम्बर के नाम पर
कहीं-कहीं वक्ष पर चढ़कर घोप दिया जाता है ख़ंजर और काट दिया स्तनों को बंजर ज़मीन के नाम पर
और जंघाओं को चिचोर कर
योनि में डाल दिया जाता है
पूँजीवादी लोहा, सरकारी तंत्र के कारतूस
और सफेद पोसियों के शब्द

बंजर ज़मीन जैसी पड़ी मृत शरीर पर
दूधमुहाँ बच्चा लेटकर निचोड़ता है माँ के स्तन
और जोर-जोर से माँ को धकियाते हुए रोता है
जबकि वहां कोई नहीं होता है
होता है केवल
महिलाओं का काला पड़ा शरीर
जो सुन नहीं सकती किसी की चींख और पुकार
भले ही बच्चों की हत्या हो बार-बार

फिर भी देश में खुशहाली है
संसद ने पूँजीवाद से हाथ मिला ली है
औरों की हत्याओं को अंजाम देने की ख़ातिर
देश के प्रकृति को चिचोरने के ख़ातिर

देश के प्रकृति को चिचोरा जा रहा है
लोगों को आग पर जोरा जा रहा है
कोई तो बताए किसका सवेरा जा रहा है
मानवता के नाम पर ढिढ़ोरा जा रहा है

फिर भी हत्याएं होती हैं रोज़
चिचोरी जाती हैं स्त्रियां
मरे हुए बैल के खाल की तरह
और स्तनों को काट दिया जाता है
बंजर ज़मीन पर उगे हुए दूब की तरह
फिर भी उग जाते है वो
अपनी ज़मीन में रंग भरने के लिए
देश में खुशहाली करने के लिए...

"सुमित चौधरी"
-/जे.एन. यू.